गिफ्ट डीड में सेवा की शर्त जरूरी : कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पति की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी के लिए अपनी सास की देखभाल करना अनिवार्य कानूनी जिम्मेदारी नहीं है। खासकर तब जब संपत्ति के गिफ्ट डीड (Gift Deed) में बहू पर सास के भरण-पोषण या देखभाल की कोई स्पष्ट शर्त न लगाई गई हो। जस्टिस सूरज गोविंदराज ने कहा कि यदि गिफ्ट डीड में साफ तौर पर यह शर्त रखी गई होती कि संपत्ति पाने वाली बहू अपनी सास का भरण-पोषण और देखभाल करेगी, तो बेटे की मृत्यु के बाद भी यह जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। लेकिन जब ऐसी कोई शर्त मौजूद नहीं है, तो परिस्थितियों में बदलाव के आधार पर ट्रिब्यूनल बाद में ऐसी जिम्मेदारी पैदा नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि “जहां ऐसी कोई शर्त मौजूद नहीं है, वहां केवल पारिवारिक परिस्थितियों में बदलाव के कारण ट्रिब्यूनल बाद में कोई नई जिम्मेदारी नहीं बना सकता।”
क्या है पूरा मामला
यह मामला हासन जिले के बेलूर तालुक की रहने वाली एस. शीला से जुड़ा है। शीला ने हासन के वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत गठित ट्रिब्यूनल के 5 मार्च 2026 के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। ट्रिब्यूनल ने उनकी 81 वर्षीय सास बी.के. नंजम्मा की शिकायत पर शीला को उनकी जरूरतों का ध्यान नहीं रखने के लिए कार्रवाई के परिणाम भुगतने की चेतावनी दी थी।
शीला के पति की वर्ष 2022 में मृत्यु हो गई थी। हाईकोर्ट में उन्होंने कहा कि पति की मृत्यु के बाद वह अपने बच्चों के साथ बिना किसी स्वतंत्र आय के खुद का गुजारा करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। दूसरी ओर, नंजम्मा को हर महीने करीब 40,000 रुपये पेंशन मिल रही है और वह आर्थिक रूप से खुद का भरण-पोषण करने में सक्षम हैं।
2010 में किया गया था गिफ्ट डीड
नंजम्मा ने वर्ष 2010 में कुछ संपत्तियों से संबंधित गिफ्ट डीड निष्पादित की थी। बाद में उन्होंने सिविल कोर्ट में इस गिफ्ट डीड को चुनौती देते हुए आरोप लगाया कि इसे धोखाधड़ी के जरिए हासिल किया गया था। हालांकि, सिविल कोर्ट ने वर्ष 2016 में उनकी याचिका खारिज कर दी थी।
इसके बाद नंजम्मा ने वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम ( Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act ) के तहत गठित ट्रिब्यूनल का रुख किया और गिफ्ट डीड को रद्द करने की मांग की। साकलेशपुर के सहायक आयुक्त, जो ट्रिब्यूनल के तौर पर कार्य कर रहे थे, ने 5 मार्च 2026 को नंजम्मा के पक्ष में आदेश दिया। इसके बाद शीला ने कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सिविल कोर्ट के फैसले से भी ट्रिब्यूनल के आदेश पर सवाल
हाईकोर्ट ने नंजम्मा के दावों में विरोधाभास पाया। कोर्ट ने कहा कि एक तरफ नंजम्मा ने सिविल कोर्ट के सामने दावा किया था कि गिफ्ट डीड धोखाधड़ी से हासिल की गई थी, जबकि बाद में उन्होंने उसी गिफ्ट डीड के आधार पर वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत राहत की मांग की। जस्टिस सूरज गोविंदराज ने कहा कि ये दोनों अलग-अलग और विरोधाभासी तथ्यात्मक दावे हैं।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब सिविल कोर्ट पहले ही गिफ्ट डीड को बरकरार रख चुका है, तो ट्रिब्यूनल यह मानकर आगे नहीं बढ़ सकता कि वह गिफ्ट डीड धोखाधड़ी, दबाव या अनुचित प्रभाव के जरिए हासिल की गई थी।
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धारा 23 के तहत ट्रिब्यूनल की शक्ति सीमित
हाईकोर्ट ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम ( Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act ) 2007 की धारा 23 का उल्लेख करते हुए कहा कि ट्रिब्यूनल ऐसी जिम्मेदारी नहीं बना सकता, जिसका गिफ्ट डीड में स्पष्ट उल्लेख नहीं है और जो कानून के तहत भी स्वतः लागू नहीं होती।कोर्ट ने अंततः शीला की याचिका स्वीकार करते हुए 5 मार्च 2026 को हासन ट्रिब्यूनल द्वारा पारित आदेश को रद्द कर दिया।
फैसले का महत्व
यह फैसला इस सवाल पर महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट करता है कि क्या संपत्ति पाने वाली बहू पर केवल पारिवारिक रिश्ते के आधार पर अपनी सास की देखभाल की कानूनी बाध्यता लगाई जा सकती है। कर्नाटक हाईकोर्ट के अनुसार, सिर्फ सास-बहू का रिश्ता होना अपने आप में संपत्ति के हस्तांतरण के साथ भरण-पोषण की ऐसी कानूनी शर्त नहीं जोड़ देता, जो गिफ्ट डीड में लिखी ही नहीं गई हो। यदि संपत्ति हस्तांतरण के समय ऐसी स्पष्ट शर्त रखी गई थी, तो उसकी कानूनी स्थिति अलग होगी।