सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले में कहा है कि किसी न्यायिक आदेश (फैसले ) को केवल निष्कर्ष तक सीमित नहीं किया जा सकता। निष्कर्ष तक पहुंचने के पीछे क्या कारण हैं, यह आदेश में स्पष्ट होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें छह लोगों को आपराधिक मुकदमे का सामना करने के लिए बुलाए जाने के आदेश को बरकरार रखा गया था। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि भारी मुकदमों का बोझ न्यायिक आदेश में कारण दर्ज नहीं करने का बहाना नहीं हो सकता।
किसी न्यायिक आदेश (फैसले ) को केवल निष्कर्ष तक सीमित नहीं किया जा सकता। निष्कर्ष तक पहुंचने के पीछे क्या कारण हैं, यह आदेश में स्पष्ट होना चाहिए – सुप्रीम कोर्ट।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट का आदेश एक reasoned and speaking order (कारणयुक्त एवं स्पष्ट न्यायिक आदेश) के न्यूनतम मानकों पर भी खरा नहीं उतरता। सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर आपत्ति जताई कि हाईकोर्ट ने उन छह आरोपियों के खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों की कोई वास्तविक जांच नहीं की, जबकि पुलिस ने जांच के बाद उन्हें आरोपपत्र में आरोपी के रूप में शामिल नहीं किया था। बाद में ट्रायल शुरू होने के बाद उन्हें CrPC की धारा 319 के तहत आवेदन पर मुकदमे में शामिल किया गया।
जजों पर मुकदमों का भारी बोझ कारण बताने से छूट नहीं देता
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट के न्यायाधीशों पर मुकदमों का भारी बोझ है और ऐसी स्थिति में संक्षिप्त आदेश लिखना व्यावहारिक हो सकता है। लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि आदेश की संक्षिप्तता कारण बताने की कीमत पर नहीं हो सकती।
बेंच ने कहा कि बेहद संक्षिप्त या laconic order को स्वीकार नहीं किया जा सकता। हर न्यायिक आदेश में वह न्यूनतम कारण होना जरूरी है, जिससे यह पता चल सके कि जज ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर अपना दिमाग लगाया है। खासतौर पर आपराधिक मामले में, जहां किसी व्यक्ति को मुकदमे का सामना करना पड़ता है, यह आवश्यकता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
क्या था पूरा मामला
यह मामला उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में दर्ज एक FIR से जुड़ा था। छह लोगों को शुरुआत में FIR में आरोपी बनाया गया था। उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम / SC-ST एक्ट की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।
हालांकि, जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने 3 अक्टूबर 2022 को आरोपपत्र दाखिल किया, लेकिन इन छह लोगों को आरोपी के तौर पर आरोपपत्र में शामिल नहीं किया। इसके बाद ट्रायल शुरू हुआ तो शिकायतकर्ता ने CrPC की धारा 319 के तहत आवेदन दाखिल कर इन लोगों को भी मुकदमे में बुलाने की मांग की। विशेष न्यायाधीश, SC/ST Act ने 11 जून 2025 को आवेदन स्वीकार कर लिय
इसके खिलाफ आरोपियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लेकिन हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने 11 अगस्त 2025 को उनकी अपील खारिज कर दी।
दो पन्नों के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश की बारीकी से समीक्षा की। पीठ ने कहा कि आदेश प्रभावी रूप से सिर्फ दो पन्नों, आठ पैराग्राफ और 15 वाक्यों का था।
आदेश के शुरुआती हिस्से में वकीलों की उपस्थिति, लागू कानूनी प्रावधान, अभियोजन का मामला और दोनों पक्षों की दलीलें दर्ज की गई थीं। इसके बाद निष्कर्ष केवल तीन पैराग्राफ में दे दिया गया।
छठे पैराग्राफ में कहा गया कि न्यायाधीश ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार किया और रिकॉर्ड की जांच की है। सातवें पैराग्राफ में कहा गया कि तथ्यों और परिस्थितियों, अपराध की गंभीरता, साक्ष्य, कथित संलिप्तता और विशिष्ट आरोपों को देखते हुए आरोपियों को समन करने के आदेश में कोई अवैधता या विकृति नहीं है। इसके बाद आठवें पैराग्राफ में अपील खारिज कर दी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश में अपील खारिज करने का कोई वास्तविक कारण नहीं बताया गया। केवल यह कह देना कि रिकॉर्ड की जांच की गई है, पर्याप्त नहीं है।
न्यायिक आदेश में कारण जरूरी हैं
सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसले Asma Lateef vs Shabbir Ahmad का भी हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी न्यायिक फैसले में, जो पक्षकारों के अधिकारों और दायित्वों को प्रभावित करता है, निष्कर्ष तक पहुंचने के कारणों का उल्लेख होना चाहिए। यह सिद्धांत आपराधिक मामलों में भी समान रूप से लागू होता है।
अदालत ने समझाया कि कारण दर्ज करने का उद्देश्य केवल औपचारिकता पूरी करना नहीं है। इससे यह पता चलता है कि न्यायाधीश ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर अपना न्यायिक विवेक लगाया है। साथ ही, जिस पक्ष के खिलाफ फैसला आया है, उसे उच्च अदालत में फैसले को प्रभावी तरीके से चुनौती देने में मदद मिलती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना कारण वाला आदेश non-application of mind यानी न्यायिक विवेक के उचित इस्तेमाल न किए जाने का संकेत दे सकता है। इससे अपीलीय अदालत के लिए भी यह समझना मुश्किल हो जाता है कि निचली अदालत या हाईकोर्ट किस आधार पर उस निष्कर्ष तक पहुंचा।
धारा 319 CrPC के मामले में साक्ष्य की जांच जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में यह कमी और गंभीर थी क्योंकि आरोपियों ने हाईकोर्ट के सामने विशेष रूप से दलील दी थी कि जांच अधिकारी को उनके खिलाफ कोई पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिला था। इसी कारण उनका नाम आरोपपत्र में शामिल नहीं किया गया था।
ऐसे में जब ट्रायल के दौरान विशेष अदालत ने उन्हें धारा 319 CrPC के तहत आरोपी के रूप में बुलाया, तो हाईकोर्ट को यह जांचना चाहिए था कि ट्रायल के दौरान सामने आया नया साक्ष्य क्या इतना मजबूत था कि उन्हें मुकदमे का सामना करने के लिए बुलाया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि Hardeep Singh vs State of Punjab मामले में संविधान पीठ ने धारा 319 CrPC के तहत किसी व्यक्ति को आरोपी के रूप में बुलाने के लिए आवश्यक कसौटी तय की है। इसलिए हाईकोर्ट को ट्रायल के दौरान सामने आए साक्ष्यों की उस कसौटी पर जांच करनी चाहिए थी।
हाईकोर्ट ने किसी साक्ष्य का उल्लेख ही नहीं किया
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट के आदेश में ऐसे किसी साक्ष्य का उल्लेख नहीं किया गया, जिसके आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि आरोपी प्रथम दृष्टया अपराध में शामिल थे।
पीठ ने कहा कि आरोपियों की यह विशेष दलील थी कि जांच में उनके खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं मिला था। ऐसे में एकल न्यायाधीश से कम से कम यह अपेक्षा थी कि वह ट्रायल के दौरान सामने आए किसी ऐसे साक्ष्य का उल्लेख करते, जिसे हरदीप मामले में संविधान पीठ द्वारा तय कसौटी पर परखा जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा किए बिना केवल अपराध की गंभीरता और आरोपों का उल्लेख कर अपील खारिज करना पर्याप्त नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश रद्द कर मामला वापस भेजा
इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। मामले को संबंधित रोस्टर बेंच के पास नए सिरे से विचार के लिए वापस भेज दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि आरोपियों, राज्य और शिकायतकर्ता को सुनने के बाद मामले पर नए सिरे से विचार किया जाए।
इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि न्यायिक आदेश छोटा हो सकता है, लेकिन बिना कारण का नहीं। मुकदमों का भारी बोझ अदालतों के लिए वास्तविक चुनौती है, लेकिन किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे में भेजने जैसे गंभीर निर्णय में यह बताना अनिवार्य है कि अदालत उस निष्कर्ष तक आखिर पहुंची कैसे।