सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ( फ़ोटो : प्रभाकर मिश्रा )
ज्यूडिशियल सर्विस में जाने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट से राहत की ख़बर आई है। 3 साल अनिवार्य प्रैक्टिस की जगह अब सिर्फ 1 साल प्रैक्टिस करनी होगी कोर्ट ने 3 साल अनिवार्य प्रैक्टिस की शर्त में बदलाव कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2025 के अपने उस फैसले में संशोधन किया है, जिसमें एंट्री-लेवल न्यायिक सेवा में नियुक्ति के लिए तीन साल की वकालत का अनुभव अनिवार्य किया गया था। कोर्ट ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर सीधी भर्ती के लिए अनिवार्य तीन साल की वकालत की शर्त को घटाकर एक साल कर दिया है। हालांकि कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि न्यायिक सेवा में प्रवेश से पहले उम्मीदवारों को कानून के व्यावहारिक पक्ष का अनुभव होना जरूरी है।
यह फैसला मई 2025 में दिए गए उस निर्णय में संशोधन करते हुए आया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने एंट्री-लेवल ज्यूडिशियल सर्विस के लिए तीन साल की प्रैक्टिस अनिवार्य की थी।
नए नियम में क्या बदला?
अब 1 अप्रैल 2027 के बाद जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं के लिए सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की परीक्षा में बैठने वाले उम्मीदवार के पास कम से कम एक साल की वास्तविक वकालत का अनुभव होना जरूरी होगा। इस प्रैक्टिस को संबंधित हाई कोर्ट द्वारा निर्धारित व्यवस्था के तहत प्रमाणित किया जाएगा।
लेकिन चयन के बाद उम्मीदवार तुरंत नियमित जज के रूप में काम नहीं करेंगे। उन्हें पहले दो साल की संरचित ट्रेनिंग और क्लर्कशिप से गुजरना होगा।
पहला साल: स्टेट ज्यूडिशियल अकादमी में गहन प्रशिक्षण।
दूसरा साल: एक साल की लॉ क्लर्कशिप। इसमें, पहले छह महीने प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश/हायर ज्यूडिशियल सर्विस के अधिकारी के अधीन काम करना होगा।अगले छह महीने संबंधित हाई कोर्ट के किसी सिटिंग जज के साथ क्लर्कशिप करनी होगी।
इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने तीन साल की पुरानी प्रैक्टिस व्यवस्था के दो साल को संरचित प्रशिक्षण और क्लर्कशिप से बदल दिया है।
2027 तक कानून के छात्रों को बड़ी राहत
कोर्ट ने एक ट्रांजिशन व्यवस्था भी बनाई है। 20 मई 2025 से 31 मार्च 2027 के बीच जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं में शामिल उम्मीदवारों को पिछली तीन साल की प्रैक्टिस की शर्त पूरी करने की जरूरत नहीं होगी। उन्हें आवेदन के लिए एक साल की प्रैक्टिस पूरी कर चुका माना जाएगा और इसके लिए अलग प्रैक्टिस सर्टिफिकेट भी नहीं देना होगा।
हालांकि चयन के बाद ऐसे उम्मीदवारों को भी Trainee Judicial Officers के रूप में एक साल की ज्यूडिशियल अकादमी ट्रेनिंग और उसके बाद एक साल की क्लर्कशिप पूरी करनी होगी।
ट्रेनिंग के दौरान मिलेगा भुगतान
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि ज्यूडिशियल अकादमी में ट्रेनिंग के दौरान ट्रेनी ज्यूडिशियल ऑफिसर्स को संबंधित राज्य में Judicial Magistrate First Class को मिलने वाले सकल वेतन/पारिश्रमिक का लगभग आधा निश्चित पारिश्रमिक दिया जाएगा।
क्लर्कशिप पूरी होने के बाद हाई कोर्ट के उस जज द्वारा उम्मीदवार की प्रदर्शन और उपयुक्तता की मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार की जाएगी, जिसके अधीन उसने क्लर्कशिप की होगी। संतोषजनक मूल्यांकन के बाद ही उसे नियमित पद पर नियुक्त किया जाएगा।
मई 2025 के फैसले में क्या कहा गया था?
मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एंट्री-लेवल ज्यूडिशियल सर्विस में सीधे प्रवेश से पहले तीन साल की प्रैक्टिस अनिवार्य कर दी थी। कोर्ट का तर्क था कि केवल कानून की डिग्री हासिल कर लेने से कोई व्यक्ति तुरंत न्यायिक अधिकारी बनने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं हो जाता। कोर्ट ने अदालत में काम करने और न्यायिक प्रक्रिया को करीब से समझने के महत्व पर जोर दिया था।
हालांकि इस व्यवस्था को लेकर नए कानून स्नातकों और कुछ लॉ यूनिवर्सिटीज की ओर से चिंता जताई गई थी। उनका तर्क था कि तीन साल की अनिवार्य प्रैक्टिस से युवा कानून स्नातकों के लिए न्यायिक सेवा में प्रवेश का रास्ता लंबा हो जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट न्यायिक गुणवत्ता और उम्मीदवारों के हितों में संतुलन
कोर्ट ने तीन साल की प्रैक्टिस की अनिवार्यता को पूरी तरह खत्म नहीं किया है। कोर्ट ने प्रैक्टिस + ट्रेनिंग + क्लर्कशिप का नया मॉडल तैयार किया है। यानी अब व्यवस्था मोटे तौर पर ऐसी होगी:
1 साल वकालत + परीक्षा + चयन + 1 साल ज्यूडिशियल अकादमी ट्रेनिंग + 1 साल क्लर्कशिप + मूल्यांकन – नियमित न्यायिक अधिकारी।
कोर्ट ने यह भी कहा है कि यह व्यवस्था अंतिम या अपरिवर्तनीय नहीं है। इसके प्रभाव का आकलन कुछ वर्षों के संस्थागत अनुभव के बाद किया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर स्कीम की समीक्षा की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला 2:1 के बहुमत से आया है। CJI सूर्यकांत और जस्टिस ए जी मसीह की पुरानी व्यवस्था के बदलाव के पक्ष में फैसला लिखे हैं जबकि जस्टिस के विनोद चंद्रन ने असहमति जताई थी और रिव्यू याचिकाओं को खारिज करने के पक्ष में थे।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट ने युवा कानून स्नातकों के लिए न्यायिक सेवा का रास्ता आसान किया है, लेकिन साथ ही यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि जज बनने से पहले उम्मीदवार को अदालत, मुकदमेबाजी और न्यायिक कामकाज का पर्याप्त व्यावहारिक अनुभव मिले।