चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ़ दिल्ली में रोज प्रदर्शन हो रहा है। लेकिन वहां नहीं, जहां अबतक प्रदर्शन होता था। जंतर मंतर पर किसी भी तरह के धरना प्रदर्शन की इजाज़त नहीं है। वहां निषेधाज्ञा लागू है। धरना स्थल को पुलिस ने अपने कब्जे में ले रखा है। जंतर मंतर को मौन करने की पूरी कोशिश हो रही है। सरकार अपने स्तर पर यह नहीं कर सकती, इसलिए अदालती आदेश के सहारे ऐसा चाहती है। हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट से एक ऐसी टिप्पणी आई थी कि जंतर मंतर पर प्रोटेस्ट की इजाज़त क्यों दी जाती है! सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका लंबित है जिसमें जंतर मंतर पर किसी भी तरह के विरोध प्रदर्शन पर रोक लगाने की मांग है।
जब NGT ने बैन लगाया था
लेकिन जंतर मंतर को मौन करने की यह कोशिश पहली बार नहीं हो रही है। NGT ने एक बार पर्यावरण की दुहाई देते हुए दिल्ली के जंतर मंतर पर किसी भी तरह के धरना प्रदर्शन पर रोक लगा दिया था। NGT के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। कोर्ट ने फैसला सुनाया जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।
आज से दस साल पहले की बात है। जंतर मंतर के आसपास के क्षेत्र में रहने वालों ने वहां धरना प्रदर्शन पर रोक के लिए NGT का दरवाजा खटखटाया। उनकी शिकायत थी कि वहां के धरना प्रदर्शन से उन्हें दिक्कत होती है। शोर शराबा होता है, ध्वनि प्रदूषण होता है, ट्रैफिक जाम की समस्या होती है। ऐसे में, जंतर मंतर के आसपास के क्षेत्र में रहने वाले लोगों को दिन-रात इसे सहन करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। NGT ने स्थानीय लोगों के पक्ष में फैसला सुनाया। NGT ने जंतर मंतर पर सभी तरह के धरना प्रदर्शन पर रोक लगाने का फैसला सुनाया। NGT ने अपने आदेश में कहा था कि भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के नाम पर ध्वनि प्रदूषण की इजाजत नहीं दी जा सकती। यह सरकार का कर्तव्य है कि वह सुनिश्चित करे कि भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के नाम पर वहां के लोगों के शांतिपूर्ण और आरामदायक जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन न हो। साथ ही NGT ने जंतर मंतर के धरना स्थल को रामलीला मैदान में शिफ्ट करने का आदेश दिया था। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
मजदूर किसान शक्ति संगठन सहित कई संगठनों ने NGT के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 23 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने NGT के आदेश पर रोक लगा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जंतर-मंतर और बोट क्लब जैसी जगहों पर विरोध प्रदर्शन और धरने आयोजित करने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। साथ ही कोर्ट ने तब केंद्र सरकार से ऐसे आयोजनों को मंजूरी देने के लिए दिशानिर्देश तैयार करने को कहा था। फैसला सुनाने वाली बेंच के जज जस्टिस एके सिकरी और जस्टिस अशोक भूषण की पीठ ने कहा था विरोध करने के अधिकार और नागरिकों के शांतिपूर्ण जीवन जीने के अधिकार जैसे परस्पर विरोधी अधिकारों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। मतलब तब सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि शांतिपूर्ण जीवन जीने के अधिकार के नाम पर विरोध करने के अधिकार की अनदेखी नहीं की जा सकती।
विरोध करने के अधिकार और नागरिकों के शांतिपूर्ण जीवन जीने के अधिकार जैसे परस्पर विरोधी अधिकारों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है – सुप्रीम कोर्ट।
आज एक बार फिर जंतर मंतर पर निषेधाज्ञा लागू है। धरना स्थल को पुलिस ने अपने कब्जे में ले रखा है। वहां प्रदर्शन की इजाज़त नहीं दी जा रही है। जंतर मंतर को बंद कर विरोध की आवाज़ को बंद करने की कोशिश हो रही है। लेकिन विरोध की आवाज़ तो कहीं से आ सकती है, सड़को से, चौराहों से। कॉलेज से, विश्वविद्यालयों से। क्योंकि लोकतंत्र में विरोध की आवाज़ को दबाना मुश्किल ही नहीं ना मुमकिन होता है! इसके लिए सत्ता को अपना चरित्र बदलना होगा ! तब लोकतंत्र नहीं बचेगा, लोकतंत्र निरंकुश तंत्र में बदल चुका होगा।