वंदे मातरम पर घमासान : सुप्रीम कोर्ट में मामला
वंदे मातरम् के सभी छह स्टेंजा गाना अनिवार्य करने और ऐसा न करने पर दंडात्मक कार्रवाई के प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। प्रसिद्ध कर्नाटक संगीत गायक और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित टी. एम. कृष्णा ने याचिका दायर की है।
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का संदर्भ देते हुए कहा कि ऐसा कोई कानून नहीं है जो किसी व्यक्ति को राष्ट्रगान गाने के लिए बाध्य करता हो। उन्होंने कहा कि 1986 के बिजॉय इमैनुएल बनाम केरल राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था ऐसा कोई कानून नहीं है जो किसी व्यक्ति को राष्ट्रगान गाने के लिए बाध्य करता हो। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहना पर्याप्त सम्मान माना जा सकता है और केवल न गाने को राष्ट्रगान के प्रति अनादर नहीं माना जा सकता।
सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट एस. मुरलीधर ने टी. एम. कृष्णा की ओर से दलील दी कि किसी व्यक्ति को वंदे मातरम् की सभी छह स्टेन्जा गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता और ऐसा नहीं करने वाले व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का प्रावधान नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से याचिका पर दो हफ्ते में जवाब दाखिल करने के लिए कहा है।
वंदे मातरम् को लेकर क्या है विवाद
केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने दिशा निर्देश जारी कर वंदे मातरम् के सभी छः स्टेन्जा गाना अनिवार्य किया है। सरकार के उसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि सरकारी और निर्धारित औपचारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के छह-स्टेन्जा वाले संस्करण को अनिवार्य करना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। मामले में एक और महत्वपूर्ण सवाल दंडात्मक प्रावधान को लेकर है। हालिया कानूनी प्रावधान में वंदे मातरम् के गायन को जानबूझकर रोकने या इसके गायन में जुटी सभा को बाधित करने को दंडनीय बनाया गया है। कोर्ट ने इस पहलू की संवैधानिकता की जांच करने में रुचि दिखाई है।
क्या है बिजॉय इमैनुएल बनाम केरल राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला
केरल के तीन स्कूली बच्चों ने अपने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था, लेकिन राष्ट्रगान के समय वे सम्मानपूर्वक खड़े थे। स्कूल प्रशासन ने दंडात्मक कार्रवाई करते हुए उन बच्चों को स्कूल से निकाल दिया था। उसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसी व्यक्ति को राष्ट्रगान गाने के लिए बाध्य करे। कोर्ट ने यह भी कहा कि सम्मानपूर्वक खड़े रहने वाले व्यक्ति का राष्ट्रगान न गाना अपने आप में अनादर नहीं है। कोर्ट ने यह भी माना था कि किसी व्यक्ति को उसकी वास्तविक और अंतरात्मा से जुड़ी आपत्ति के बावजूद राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर करना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और अनुच्छेद 25(1) से जुड़े अधिकारों के सवाल पैदा कर सकता है।
सॉलिसिटर जनरल ने वंदे मातरम् के गायन का विरोध करने वालों को ‘नक्सली’ कहा
मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर के बीच तीखी बहस भी हुई। बहस के दौरान मेहता ने वंदे मातरम् के गायन का विरोध करने वालों के संदर्भ में ‘नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल किया, जिस पर मुरलीधर ने आपत्ति जताई।
Related Video:
अब इस मामले में केंद्र सरकार के जवाब के बाद सुप्रीम कोर्ट यह देखेगा कि वंदे मातरम् के गायन से संबंधित सरकारी निर्देश और विशेष रूप से उसके उल्लंघन पर संभावित आपराधिक कार्रवाई संविधान की कसौटी पर कितनी टिकती है।
मामले का अहम सवाल यही है कि देशभक्ति और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के साथ-साथ क्या किसी नागरिक को किसी गीत को गाने के लिए कानून के जरिए बाध्य किया जा सकता है? सरकार के इस फरमान का विपक्ष विरोध कर रहा था, अब तक ये सवाल राजनीतिक था। अब चूंकि मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है, अब सवाल संवैधानिक हो गया है।