ममता बनर्जी की सत्ता चली गई। पार्टी में फूट पड़ गई। चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस का नाम और चुनाव चिन्ह भी फ्रीज कर दिया है। दीदी की पार्टी का अस्तित्व ख़तरे में हैं, दीदी ने देश की सबसे बड़ी अदालत से न्याय की गुहार लगाई है।
ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) की स्थापना करके पश्चिम बंगाल की राजनीति में कई बड़े परिवर्तन किए थे. लेकिन जिस तृणमूल कांग्रेस को ममता बनर्जी ने अपने दम पर खड़ा किया था, आज वही पार्टी अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही है। चुनाव आयोग ने टीएमसी का नाम और ‘जोड़ा फूल’ वाला चुनाव चिन्ह दोनों की फ्रीज कर दिया है। पार्टी दो गुटों में बंट चुकी है और दोनों ही खुद को असली टीएमसी बता रहे हैं। नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव से पहले अब चुनाव आयोग ने ममता गुट को नया नाम ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल’ और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ का चुनाव चिन्ह दिया है, जिसका सीधा कनेक्शन ‘खेला होबे’ नारे से जोड़ा जा रहा है. वहीं तृणमूल कांग्रेस के दूसरे गुट, ऋतब्रत बनर्जी को ‘लिफाफा’ चिन्ह दिया गया है।
चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ़ दीदी ने देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाया है। क्योंकि ममता बनर्जी और उनकी पार्टी का अस्तित्व ख़तरे में है।
तो आइए संवैधानिक प्रावधानों के जरिए समझते हैं कि आगे क्या होगा और क्या हो सकता है
कुछ सवाल हैं जिनका जवाब ढूंढता होगा –
1.क्या किसी पार्टी के टूटने के बाद उसका नाम और चुनाव चिन्ह भी छिन सकता है?
2. क्या पार्टी पर अधिकार उस नेता का होता है जिसने पार्टी बनाई? या उन विधायकों का जो बहुमत में हैं?
इस पूरे विवाद को समझने के लिए हमें महाराष्ट्र के शिवसेना विवाद को भी समझना होगा।
ये तो पता ही है कि ममता बनर्जी की कुर्सी कैसे गई? 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में दीदी हार गईं। तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा। कैसे हारीं, क्या SIR के जरिए उनको हराया गया? इस पर बहुत बात हो चुकी है, इसलिए इस विडियो में हम केवल पार्टी और चुनाव चिन्ह वाले मामले पर बात करेंगे।
तृणमूल के सत्ता से बाहर होते ही पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर विवाद सामने आया। रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी के एक बड़े धड़े (बागी विधायकों) ने ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती दी और अलग दावा पेश किया। दोनों गुटों ने पार्टी पर अपने-अपने अधिकार का दावा किया। मामला चुनाव आयोग तक पहुँचा।
चुनाव आयोग के सामने सवाल था कि आखिर असली तृणमूल कांग्रेस कौन है? किस गुट को पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह मिलना चाहिए? और इसी विवाद के बीच आयोग ने दोनों गुटों के लिए अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह की अंतरिम व्यवस्था की। ममता बनर्जी के गुट को फुटबॉल खिलाड़ी का चिन्ह मिला और दूसरे गुट को लिफाफे का चिन्ह।
पार्टी का असली दावेदार कौन
ममता बनर्जी अपनी पार्टी के नाम पर चुनाव चिन्ह के दावे के साथ सुप्रीम कोर्ट पहुंची हैं। अब देश की सबसे बड़ी अदालत को तय करना है कि पार्टी का असली दावेदार कौन होगा? यहां एक संवैधानिक सवाल है कि क्या पार्टी का चुनाव चिन्ह नेता की निजी संपत्ति है तो इसका। जवाब है – नहीं।
राजनीतिक दल सिर्फ एक नेता का नाम नहीं होता। वह एक संगठन होता है। उसके संविधान होते हैं। उसके कार्यकर्ता होते हैं। उसके निर्वाचित प्रतिनिधि होते हैं। चुनाव चिन्ह किसी राजनीतिक दल की चुनावी पहचान से जुड़ा होता है। इसके आवंटन और विवादों पर चुनाव आयोग कानून के तहत फैसला करता है। जब किसी पार्टी में विभाजन होता है, तो आयोग को यह तय करना पड़ता है कि कौन-सा गुट पार्टी की मान्यता और आरक्षित चिन्ह का हकदार है। यहाँ पार्टी का संविधान, संगठनात्मक समर्थन, विधायी समर्थन और लागू कानूनी सिद्धांत महत्वपूर्ण हो सकते हैं। यही सवाल शिवसेना के विवाद में भी सामने आया था।
शिवसेना विवाद में क्या हुआ था
2022 में महाराष्ट्र में शिवसेना के भीतर बड़ा राजनीतिक विभाजन हुआ। उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे के गुट आमने-सामने आ गए। एकनाथ शिंदे गुट ने पार्टी के नाम और धनुष-बाण चुनाव चिन्ह पर दावा किया। फरवरी 2023 में चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और धनुष-बाण चिन्ह दिया। इस फैसले को उद्धव ठाकरे गुट ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सितंबर 2026 बीतने को है, इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में अभी भी सुनवाई चल ही रही है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल यह है कि चुनाव आयोग ने शिवसेना के मामले में पार्टी की पहचान तय करने के लिए किन मानदंडों का इस्तेमाल किया? और क्या उस प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा हो सकती है? हाल की सुनवाई में अदालत ने आयोग के विवेकाधिकार और दोनों गुटों के लिए अलग चिन्ह जैसे सवालों पर चर्चा की है।
शिवसेना के मामले में सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला होगा, बहुत हद तक ममता बनर्जी के दावे का भविष्य तय करेगा। फिलहाल दीदी को उद्धव ठाकरे की तरह ही लंबा इंतज़ार करना पड़ेगा। क्योंकि जल्दी ममता बनर्जी को होगी, सुप्रीम कोर्ट तो अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार ही सुनवाई करेगा।