नोएडा में श्रमिकों के प्रोटेस्ट के दौरान DU की छात्रा पर NSA लगाने के मामले में नोएडा डीएम मेधा रूपम को राहत मिल गई।
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दिया जिसके तहत स्टूडेंट की NSA के तहत हिरासत को रद्द किया गया था। लेकिन सुनवाई करने वाली बेंच को लेकर सवाल खड़ा हो गया है।
हाईकोर्ट ने नोएडा की DM मेधा रूपम के खिलाफ कड़ी टिप्पणियां भी की थीं। कोर्ट ने छात्र को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने यह राशि जिलाधिकारी के व्यक्तिगत वेतन से वसूलने का भी निर्देश दिया था। लेकिन जिस बेंच ने यह मेधा रूपम को राहत दी है, यह मामला तो उस बेंच के पास ही नहीं था। मेधा रूपम की याचिका पर जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन के सिंह की बेंच ने सुनवाई की जबकि यह मामला जस्टिस नागरत्ना की बेंच के सामने जाना चाहिए था।
वकीलों के संगठन लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन ने CJI सूर्यकांत को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि मौजूदा रोस्टर के बावजूद इस मामले को विशेष रूप से एक विशेष बेंच के सामने सुनवाई के लिए लगाया गया। पत्र में कहा गया है कि याचिकाकर्ता एक लोक सेवक हैं और भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त की बेटी हैं।
बुधवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी। लेकिन सवाल उठ रहा है कि नोएडा डीएम का मामला इस बेंच के सामने पहुंचा कैसे? जबकि 13 जुलाई 2026 से लागू सुप्रीम कोर्ट के रोस्टर के मुताबिक हैबियस कॉर्पस और प्रिवेंटिव डिटेंशन से जुड़े मामलों की सुनवाई इस बेंच, को आवंटित नहीं है। नोएडा श्रमिक प्रोटेस्ट से संबंधित अन्य याचिकाएं पहले से जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष लंबित हैं।
सुप्रीम कोर्ट की 13 जुलाई 2026 से प्रभावी रोस्टर के मुताबिक
हैबियस कॉर्पस और प्रिवेंटिव डिटेंशन से संबंधित मामलों को सुनवाई क्रम से शुरुआती चार पीठों को सौंपी गई है जिसमें
• CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच
• जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली बेंच
• जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली बेंच और
• जस्टिस एम.एम. सुंदरेश की अध्यक्षता वाली बेंच शामिल है
इस रोस्टर में जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच शामिल नहीं है।
जहां तक नोएडा श्रमिकों से जुड़े प्रोटेस्ट से जुड़े मामलों का सवाल है, इस प्रोटेस्ट से जुड़े कई मामले जस्टिस नागरत्ना की बेंच के सामने में लंबित हैं। लाइव लॉ की रिपोर्ट में बताया गया है कि नोएडा प्रोटेस्ट से जुड़ा आदित्य आनंद और रूपेश राय की हिरासत का मामला जस्टिस नागरत्ना की बेंच के सामने लंबित है। पहला मामला केशव आनंद की ओर से दायर है। केशव आनंद ने अपने भाई आदित्य आनंद, जो कि सॉफ्टवेयर इंजीनियर और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, तथा ऑटो ड्राइवर रूपेश राय की गिरफ्तारी को भी चुनौती दी गई थी।
यह मामला जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ के सामने आया था। 8 मई को कोर्ट ने नोटिस जारी किया गया। इसके बाद 15 मई को जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस भुइयां ने उत्तर प्रदेश पुलिस को दोनों आरोपियों को अदालत के सामने पेश करने का निर्देश दिया था। सुनवाई के बेंच की ओर से मौखिक टिप्पणी भी की गई थी कि ये दोनों मजदूरों के वेतन में बढ़ोतरी की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे और उन्हें आतंकवादी की तरह देखने की जरूरत नहीं है। इसके अलावा लाइव लॉ की रिपोर्ट में नोएडा प्रोटेस्ट से जुड़े कई मामलों का हवाला दिया गया कि सभी मामले जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस भुइयां की बेंच के सामने लंबित हैं।
ऐसे में सवाल तो बनता ही है कि नोएडा डीएम का ये मामला जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एक के सिंह की बेंच के सामने कैसे आया ? क्या इसके लिए कोई विशेष निर्देश था या CJI की नजर में यह मामला कुछ अलग था। क्योंकि रोस्टर तो CJI ही तय करते हैं। CJI इज मास्टर ऑफ द रोस्टर। यह सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले में खुद कह चुका है।
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रोस्टर से जुड़ा पुराना मामला तो याद ही होगा। जब जस्टिक रंजन गोगोई सहित सुप्रीम कोर्ट के चार सीनियर मोस्ट जजों ने तत्कालीन CJI जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेस किया था। उस समय जस्टिस दीपक मिश्रा पर आरोप लगा था कि CJI संवेदनशील मामलों को अपने सामने लिस्ट कर रहे हैं। इसमें जस्टिस लोया की संदिग्ध मौत से जुड़ा मामला भी शामिल था। उसके बाद खूब हंगामा मचा था। जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग की मांग की गई थी। न्यायपालिका के इतिहास में वह प्रेस कॉन्फ्रेस दर्ज हो गया।
नोएडा DM मेधा रूपम के मामले की लिस्टिंग को लेकर गंभीर सवाल है। CJI जस्टिस सूर्यकांत से सवाल पूछा जाएगा, क्योंकि CJI ही रोस्टर के मालिक हैं।
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