मम्मी- पापा अलग हो गए, बच्चा किसके पास रहेगा !
भारत में वैवाहिक विवादों के दौरान पालतू जानवरों की कस्टडी, मुलाकात और देखभाल को लेकर अदालतों के सामने नए तरह के सवाल उभर रहे हैं। मौजूदा भारतीय कानून में ऐसा कोई विशिष्ट ढांचा नहीं है जो यह तय करता हो कि अलगाव या वैवाहिक विवाद के बाद किसी पालतू जानवर की कस्टडी किसे मिलेगी। ऐसे मामलों में अदालतों को मौजूदा दीवानी, प्रक्रियात्मक और पशु कल्याण कानूनों के आधार पर रास्ता तलाशना पड़ रहा है।
यह मुद्दा अब केवल काल्पनिक नहीं रह गया है। Bar & Bench में 17 सितंबर 2026 को प्रकाशित अधिवक्ता वेदांग खेरा के कॉलम के अनुसार, दिल्ली और बॉम्बे हाई कोर्ट के सामने पालतू जानवरों की कस्टडी और मुलाकात से जुड़े मामले आ चुके हैं। खेरा दिल्ली हाई कोर्ट और दिल्ली की जिला अदालतों में वकालत करते हैं।
कानून में स्पष्ट कस्टडी व्यवस्था नहीं
खेरा के अनुसार, Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960 में “animal” की व्यापक परिभाषा दी गई है। कानून की धारा 3 किसी ऐसे व्यक्ति पर, जिसके पास किसी जानवर की देखभाल या जिम्मेदारी है, उसके कल्याण के लिए उचित कदम उठाने और अनावश्यक दर्द या पीड़ा रोकने की जिम्मेदारी डालती है। हालांकि, इस कानून में यह व्यवस्था नहीं है कि पति-पत्नी के अलग होने की स्थिति में पालतू जानवर किसके पास रहेगा।
कॉलम में इस कानूनी स्थिति को दो स्तरों के बीच का क्षेत्र बताया गया है। एक तरफ पालतू जानवर स्वामित्व और कब्जे से जुड़े दावों का विषय हो सकता है, जबकि दूसरी तरफ वह संवेदनशील जीव है जिसका कल्याण अदालत के फैसले से प्रभावित हो सकता है। वेदांग खेरा का तर्क है कि पालतू जानवर को न तो केवल संपत्ति की तरह देखा जाना चाहिए और न ही बच्चे के समान।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का संदर्भ
कॉलम में Animal Welfare Board of India v. A Nagaraja (2014) का उल्लेख किया गया है। फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पशु कल्याण के महत्व और जानवरों की दर्द तथा पीड़ा महसूस करने की क्षमता पर जोर दिया था। इसके बाद Animal Welfare Board of India v. Union of India (2023) में संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान जानवरों को मनुष्यों के समान मौलिक अधिकार प्रदान नहीं करता।
कॉलम के अनुसार, इसका यह अर्थ नहीं है कि कस्टडी तय करते समय जानवर का कल्याण अप्रासंगिक हो जाता है। लेखक इसी आधार पर संपत्ति-केंद्रित दृष्टिकोण और बच्चे की कस्टडी के मानकों के बीच एक अलग कानूनी क्षेत्र की जरूरत की बात रखते हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट में तीन Toy Pomeranians का मामला
2026 में दिल्ली हाई कोर्ट ने Sunil Malhotra & Ors. v. State, NCT of Delhi & Ors. मामले में तीन Toy Pomeranians- Mishti, Coco और Cotton की कस्टडी पर विचार किया। इन कुत्तों को कथित रूप से खराब परिस्थितियों से बचाया गया था और बाद में उन्हें गोद लिया गया। एक अन्य व्यक्ति ने उनके स्वामित्व का दावा किया और उन्हें छोड़े जाने का आदेश हासिल किया, जिसके बाद गोद लेने वाले देखभालकर्ताओं ने हाई कोर्ट का रुख किया।
कॉलम के मुताबिक, जस्टिस गिरिश कथपालिया ने कहा कि बचाए गए कुत्तों की कस्टडी को निर्जीव वस्तु की कस्टडी के समान नहीं माना जा सकता। अदालत ने कुत्तों और उनके देखभालकर्ताओं के भावनात्मक संबंध तथा उन्हें अलग किए जाने से होने वाले संभावित भावनात्मक आघात पर भी विचार किया। अंततः पक्षकारों की सहमति से कुत्तों को याचिकाकर्ताओं के पास रखने की अनुमति दी गई, जो उनके कल्याण के अधीन थी।
यह मामला वैवाहिक विवाद नहीं था, लेकिन वेदांग के अनुसार इससे यह संकेत मिलता है कि किसी जानवर और उसके देखभालकर्ता के बीच मौजूदा संबंध कस्टडी से जुड़े न्यायिक निर्णय में प्रासंगिक हो सकता है।
बॉम्बे हाई कोर्ट में साझा देखभाल की व्यवस्था
एक अन्य मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट के सामने वैवाहिक विवाद के दौरान Tikki नामक कुत्ते की कस्टडी और मुलाकात का प्रश्न आया। स्रोत के अनुसार, फैमिली कोर्ट ने पत्नी की कुत्ते तक पहुंच और कस्टडी की मांग यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि ऐसा राहत देने के लिए कोई विशिष्ट कानूनी प्रावधान नहीं है।
इसके बाद हाई कोर्ट ने एक मध्यस्थ नियुक्त किया और पक्षकारों के बीच समझौता हुआ। समझौते के तहत पत्नी को हर महीने की शुरुआत में 14 दिनों के लिए Tikki की कस्टडी मिलनी थी। व्यवस्था में कुत्ते को एक पक्ष से दूसरे पक्ष को सौंपने, भोजन, चिकित्सा खर्च, ग्रूमिंग, यात्रा और पशु चिकित्सकीय देखभाल से जुड़े प्रावधान भी शामिल थे।
कॉलम इस उदाहरण के जरिए यह रेखांकित करता है कि पालतू जानवर से जुड़ा विवाद केवल यह तय करने तक सीमित नहीं रहता कि उसका मालिक कौन है। बीमारी, यात्रा, नियमित देखभाल और अन्य व्यावहारिक जिम्मेदारियां भी अलग से तय करनी पड़ सकती हैं।
दिल्ली में Henry की कस्टडी और मुलाकात का विवाद
आर्टिकल में दिल्ली हाई कोर्ट में महुआ मोइत्रा के पालतू कुत्ते Henry, एक Rottweiler, से जुड़े मामले का भी ज़िक्र है। Mahua Moitra v. Jai Anant Dehadrai (2026) मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के सामने CPC की धारा 151 के तहत अंतरिम रूप से Henry से हर 10 दिनों में तीन बार मुलाकात की मांग वाली अर्जी का उल्लेख किया गया है।
किन बातों को कस्टडी तय करते समय देखा जा सकता है?
खेरा के कॉलम में, मौजूदा कानून में स्पष्ट वैधानिक व्यवस्था न होने की स्थिति में, कुछ संभावित मानदंड सुझाए गए हैं:
- प्राथमिक देखभाल: जानवर को वास्तव में कौन खिलाता है, घुमाता है, पशु चिकित्सक के पास ले जाता है और उसकी दैनिक दिनचर्या संभालता है।
- रिश्ते की अवधि और प्रकृति: जानवर और प्रत्येक पति या पत्नी के बीच संबंध कितने समय से है और किस प्रकार का है।
- घर की स्थिरता और उपयुक्तता: काम के घंटे, उपलब्ध देखभालकर्ता, रहने की व्यवस्था, पशु चिकित्सकीय सुविधा और जानवर की स्थापित दिनचर्या।
- आर्थिक योगदान: खर्च उठाना प्रासंगिक हो सकता है, लेकिन लेखक के अनुसार इसे अपने-आप कस्टडी निर्धारित करने वाला कारक नहीं माना जाना चाहिए।
- क्रूरता या उपेक्षा: क्रूरता, उपेक्षा, परित्याग या जानवर को जोखिम में डालने वाला आचरण महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
- बच्चों का संबंध: यदि बच्चे परिवार का हिस्सा हैं तो जानवर के साथ उनके संबंध को भी देखा जा सकता है, हालांकि लेखक इसे बच्चे की कस्टडी के “best interests” परीक्षण को पालतू विवादों में लागू करने के समान नहीं मानते।
साझा कस्टडी के बारे में भी कॉलम सावधानी की बात करता है। दो घरों के बीच जानवर को लगातार ले जाना कुछ पालतू जानवरों के लिए सहज हो सकता है, जबकि अन्य के लिए स्थिर वातावरण और एक जैसी दिनचर्या अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
अलग कानून या मौजूदा फैमिली लॉ में बदलाव?
खेरा का सुझाव है कि भारत को जरूरी नहीं कि अलग से “Pet Custody Act” बनाना पड़े। उनके अनुसार, एक व्यावहारिक विकल्प मौजूदा फैमिली लॉ ढांचे में companion animals से जुड़े प्रावधान शामिल करना हो सकता है।
कॉलम में फैमिली कोर्ट को पति-पत्नी या पूर्व पति-पत्नी के बीच companion animals से जुड़े विवाद तय करने का स्पष्ट अधिकार देने, अंतरिम कस्टडी आदेश जारी करने, प्राथमिक देखभालकर्ता की भूमिका को मान्यता देने और उपयुक्त मामलों में मुलाकात की व्यवस्था करने जैसे विकल्प सुझाए गए हैं।
मध्यस्थता को भी संभावित ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है। लेखक के अनुसार, पालतू जानवरों से जुड़े विवादों में चिकित्सा खर्च, यात्रा, हैंडओवर, ग्रूमिंग और मुलाकात जैसी लगातार चलने वाली जिम्मेदारियां होती हैं, जिन्हें मध्यस्थ समझौता अदालत के सामान्य स्वामित्व आदेश की तुलना में अधिक व्यावहारिक ढंग से संबोधित कर सकता है।
कॉलम में अमेरिकी राज्य इलिनॉय के कानून का भी उदाहरण दिया गया है। Illinois Marriage and Dissolution of Marriage Act की धारा 503(n) के अनुसार, विवाह-विच्छेद की कार्यवाही में अदालत companion animal के एकल या संयुक्त स्वामित्व और जिम्मेदारी का आवंटन करते समय उसके कल्याण पर विचार कर सकती है। लेखक साथ ही स्पष्ट करते हैं कि भारत को विदेशी कानून को यांत्रिक रूप से अपनाने की जरूरत नहीं है।
आगे की कानूनी चुनौती
कॉलम के अनुसार, भारतीय वैवाहिक कानून में तलाक, भरण-पोषण, आवास और बच्चों की कस्टडी के लिए विस्तृत व्यवस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन companion animals से जुड़े विवादों के लिए स्पष्ट प्रावधान नहीं है। हालिया मामलों से पता चलता है कि अदालतें व्यावहारिक समाधान तलाश रही हैं, लेकिन इन मामलों के लिए एक समान सिद्धांत अभी स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं हुआ है।
लेखक का निष्कर्ष है कि दीर्घकाल में संसद को इस सवाल पर विचार करना पड़ सकता है कि क्या फैमिली लॉ में companion animals से जुड़े विवादों को स्पष्ट रूप से मान्यता दी जानी चाहिए। उनके प्रस्तावित दृष्टिकोण में केंद्रीय सवाल केवल यह नहीं होगा कि पालतू जानवर का मालिक कौन है, बल्कि यह होगा कि मानवीय रिश्ते के टूटने के बाद कौन-सी व्यवस्था उस जानवर के कल्याण में सबसे कम व्यवधान पैदा करेगी।