दलित मुस्लिम और दलित ईसाई को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं मिलेगा, जस्टिस बालाकृष्णन आयोग की रिपोर्ट तैयार
अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति, यदि अपना धर्म बदलकर इस्लाम या ईसाई धर्म अपना लेता है, तो क्या उसे अनुसूचित जाति को मिलने वाला लाभ मिलेगा। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक पूर्व CJI जस्टिस केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाला पैनल यह सिफारिश करने वाला है कि जो लोग अपना धर्म बदलकर इस्लाम या ईसाई धर्म अपना लेते हैं, उनको अनुसूचित जाति को मिलने वाला लाभ नहीं मिलना चाहिए। उनको अभी भी ये लाभ नहीं मिलता है।
धर्म बदल चुके दलितों को अनुसूचित जाति की लिस्ट में शामिल करने की ये माँग बहुत पुरानी है। 20 साल से अधिक समय से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। कन्वर्टेड दलितों की मांग है कि धर्म बदलने के बाद भी उनका अनुसूचित जाति वाला दर्जा बरकरार रहे, जिससे उन्हें आरक्षण का लाभ मिलता रहे।
धर्मांतरण रोकने के लिए आई थी व्यवस्था
रिलिजियस कन्वर्जन को हतोत्साहित करने के लिए 1950 में राष्ट्रपति के आदेश के जरिए व्यवस्था तय हुई कि हिंदू धर्म से अलग किसी अन्य धर्म को मानने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा। मतलब धर्म छोड़ने पर अनुसूचित जाति को मिलने वाली सभी सुविधाएं छोड़नी पड़ेगी।
राष्ट्रपति के इस आदेश में 1956 में पहला संशोधन हुआ जिसके जरिए सिख धर्म अपनाने वाले लोगों को छूट दे दी गई। उसके बाद 1990 में बौद्ध धर्म को भी छूट मिल गई। मतलब हिंदू धर्म छोड़कर, सिख और बौद्ध धर्म अपनाने वाले अनुसूचित जाति के सदस्यों को अनुसूचित जाति का दर्जा बरकरार कर दिया गया जिससे अनुसूचित जाति को मिलने वाली सुविधा बहाल हो गई। बच गए इस्लाम और ईसाई धर्म अपनाने वाले।
यही दलित मुस्लिम और दलित ईसाई, लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि उन्हें भी अनुसूचित जाति की सूची में शामिल किया जाए जिससे उनको भी आरक्षण सहित अनुसूचित जातियों को मिलने वाला लाभ मिलता रहे। उनकी दलील है कि धर्म बदलने से जाति और सामाजिक स्थिति हमेशा नहीं बदलती। और अगर किसी व्यक्ति को धर्म बदलने के बाद भी सामाजिक और जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता है, तो केवल धर्म के आधार पर अनुसूचित जाति के अधिकारों से वंचित क्यों किया जाए ?
इसी विवाद को सुलझाने के लिए मौजूदा केंद्र सरकार ने पूर्व CJI जस्टिस केजी बालकृष्णन की अध्यक्षता में एक आयोग बनाया। आयोग का काम यह देखना है कि क्या अनुसूचित जाति का दर्जा धर्म के आधार पर मिलना चाहिए या इसे धर्म से अलग करके देखा जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें तो क्या सिख और बौद्ध धर्म अपनाने वालों की तरह ही इस्लाम और ईसाइयत अपनाने वालों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जा सकता है या नहीं!
पहले के आयोगों और कमेटी ने क्या कहा था
इस मुद्दे पर पहले भी कई आयोग और समितियां विचार कर चुकी हैं। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान और उनके सुधार के उपाय सुझाने के लिए 1953 में गठित काका कालेलकर आयोग ने स्वीकार किया कि धर्म परिवर्तन के बावजूद जातिगत भेदभाव और सामाजिक पिछड़ापन समाप्त नहीं होता। लेकिन आयोग ने दलित ईसाइयों और दलित मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की जगह कहा कि इन्हें OBC का दर्जा दिया जा सकता है।
उसके बाद साल 2006 जस्टिस राजेंद्र सच्चर समिति ने इस संबंध में रिपोर्ट दी। सच्चर समिति ने भी दलित मुस्लिम और ईसाइयों को अनुसूचित का दर्जा देने की सिफारिश नहीं की।
लेकिन जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग का रुख अलग था। वर्ष 2005 में गठित रंगनाथ मिश्र आयोग ने कहा कि किसी व्यक्ति का अनुसूचित जाति का दर्जा उसके धर्म पर निर्भर नहीं होना चाहिए। मतलब धर्म छोड़ने के बाद भी अनुसूचित जाति का दर्जा बहाल रहना चाहिए। – आयोग के निष्कर्ष का मूल आधार यह था कि धर्म परिवर्तन से हमेशा सामाजिक और जातिगत पिछड़ापन खत्म नहीं होता।
आयोग ने यह भी तर्क दिया कि अगर सामाजिक भेदभाव और जातिगत पिछड़ापन धर्म परिवर्तन के बाद भी जारी रहता है, तो केवल धर्म के आधार पर SC संरक्षण से बाहर करना उचित नहीं माना जाना चाहिए। लेकिन सरकार ने रंगनाथ मिश्र आयोग की इस सिफारिश को स्वीकार नहीं किया।
केंद्र सरकार ने 7 दिसंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग की 2007 की रिपोर्ट त्रुटिपूर्ण थी, इसे एक कमरे की चारदीवारी के भीतर तैयार किया गया था। सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि यह रिपोर्ट एक कमरे की चारदीवारी के भीतर तैयार की गई। कोई फील्ड स्टडी नहीं की गई… आयोग ने भारत के सामाजिक परिवेश को बहुत सीमित नजरिए से देखा। रंगनाथ मिश्र आयोग के निष्कर्षों को सरकार ने स्वीकार नहीं किया है।
उसके बाद सरकार ने पूर्व CJI जस्टिस के.जी. बालकृष्णन की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया था। के . जी. बालकृष्णन आयोग जल्दी ही अपना रिपोर्ट सौंपने वाला है।